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शासकीय प्राथमिक पाठशाला पडिया की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल, मीडिया विजिट में सामने आई गंभीर हकीकत

जिला रीवा के जन शिक्षा केंद्र निपनिया अंतर्गत आने वाली शासकीय प्राथमिक पाठशाला पडिया में उस समय शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति सामने आ गई, जब मीडिया टीम द्वारा विद्यालय का औचक निरीक्षण किया गया। इस दौरान विद्यालय में प्रभारी शिक्षक श्री मनोज श्रीवास्तव उपस्थित पाए गए।

शासकीय प्राथमिक पाठशाला पडिया की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल, मीडिया विजिट में सामने आई गंभीर हकीकत

रीवा | मध्य प्रदेश

जिला रीवा के जन शिक्षा केंद्र निपनिया अंतर्गत आने वाली शासकीय प्राथमिक पाठशाला पडिया में उस समय शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति सामने आ गई, जब मीडिया टीम द्वारा विद्यालय का औचक निरीक्षण किया गया। इस दौरान विद्यालय में प्रभारी शिक्षक श्री मनोज श्रीवास्तव उपस्थित पाए गए।
मीडिया टीम की मौजूदगी में जब विद्यालय के बच्चों से बेहद बुनियादी सवाल पूछे गए—जैसे ए बी सी डी (ABCD), अक्षर पहचान और सरल ज्ञान से जुड़े प्रश्न—तो बच्चे उनके सही जवाब देने में असमर्थ नजर आए। यह स्थिति तब और भी चिंताजनक हो जाती है जब यह एक प्राथमिक विद्यालय है, जहाँ बच्चों की नींव मजबूत की जानी चाहिए।
एक ओर प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाने को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों को सरकार द्वारा लाखों रुपये वार्षिक वेतन दिया जा रहा है, इसके बावजूद बच्चों का शैक्षणिक स्तर इस कदर कमजोर होना कई सवाल खड़े करता है।
स्थानीय लोगों और अभिभावकों का कहना है कि विद्यालयों में नियमित पढ़ाई और निगरानी का अभाव है। बच्चों को समय पर गुणवत्ता युक्त शिक्षा नहीं मिल पा रही है, जिसका सीधा असर उनके भविष्य पर पड़ रहा है।
मीडिया टीम के निरीक्षण के बाद यह स्पष्ट होता है कि केवल योजनाओं और घोषणाओं से शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती, बल्कि इसके लिए शिक्षकों की जवाबदेही, नियमित निरीक्षण और कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या शिक्षा विभाग इस गंभीर स्थिति को संज्ञान में लेकर जिम्मेदारों पर कार्रवाई करेगा, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरत पर इस तरह की लापरवाही न सिर्फ बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि सरकार की मंशा और दावों पर भी सवालिया निशान खड़े करती है।

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