मऊगंज में दिव्यांगों के साथ 'डिजिटल क्रूरता': 3 महीने से पेंशन ठप, अब जनपद सीईओ के व्हाट्सएप आदेश ने बेसहाराओं को सड़क पर ला दिया!
देश अध्यक्ष अशोक विश्वकर्मा की दहाड़— "सरकार की संवेदनहीनता की हद पार"; पत्रकार दीपक गुप्ता का सीधा सवाल— "खाता बदलने से पेट भरेगा या पेंशन आएगी

मऊगंज में दिव्यांगों के साथ ‘डिजिटल क्रूरता’: 3 महीने से पेंशन ठप, अब जनपद सीईओ के व्हाट्सएप आदेश ने बेसहाराओं को सड़क पर ला दिया!*
*प्रदेश अध्यक्ष अशोक विश्वकर्मा की दहाड़— “सरकार की संवेदनहीनता की हद पार”; पत्रकार दीपक गुप्ता का सीधा सवाल— “खाता बदलने से पेट भरेगा या पेंशन आएगी?”*
*मऊगंज/भोपाल |* मध्य प्रदेश में ‘सुशासन’ की दावों की धज्जियां खुद सरकारी तंत्र उड़ा रहा है। प्रदेश के लाखों दिव्यांग, विधवा और वृद्ध पिछले 3 महीनों से अपनी सामाजिक सुरक्षा पेंशन के लिए तरस रहे हैं। नए साल की शुरुआत इन बेसहारा लोगों के लिए खुशियां नहीं, बल्कि फाकाकशी की नौबत लेकर आई है। बेरोजगारी और कड़कती ठंड के बीच ये लोग अपनी दवाइयों और निवाले के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन सरकार ‘मूकदर्शक’ बनी बैठी है। मऊगंज जिले में स्थिति और भी भयावह हो गई है। *मऊगंज जनपद सीईओ* ने हर ग्राम पंचायत में व्हाट्सएप के माध्यम से एक तुगलकी फरमान जारी किया है कि सभी दिव्यांगों, विधवाओं और वृद्धाओं का *’खाता चेंज’* किया जाए। निडर *दिव्यांग पत्रकार दीपक गुप्ता* ने इस आदेश पर प्रशासन की चूलें हिलाते हुए सवाल पूछा है— “साहब, क्या आपके पास इस बात की लिखित गारंटी है कि खाता बदलने के बाद रुकी हुई पेंशन तुरंत आ जाएगी? क्या आपको अंदाजा है कि एक दिव्यांग के लिए इस ठंड में बार-बार बैंकों और दफ्तरों के चक्कर काटना कितना कष्टकारी है?” दिव्यांगों के हक की लड़ाई लड़ रहे *प्रदेश अध्यक्ष अशोक विश्वकर्मा* ने सरकार और प्रशासन को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने दो टूक कहा है कि सरकार एक तरफ ‘लाड़ली बहनों’ के जरिए वाहवाही लूट रही है, लेकिन समाज के सबसे कमजोर अंग—दिव्यांगों को तिल-तिल मरने के लिए छोड़ दिया गया है। विश्वकर्मा ने चेतावनी दी कि यदि 3 महीने की रुकी हुई पेंशन तत्काल जारी नहीं हुई, तो मऊगंज से लेकर भोपाल तक सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला जाएगा। पत्रकार दीपक गुप्ता लगातार ज़मीनी हकीकत दिखा रहे हैं कि कैसे पेंशन न मिलने से दिव्यांग अपनी जीवन रक्षक दवाइयां नहीं खरीद पा रहे हैं। बेरोजगारी और लाचारी के बीच पेंशन ही उनका एकमात्र सहारा थी, जिसे प्रशासन ने कागजी औपचारिकता और ‘खाता बदलने’ के खेल में उलझा दिया है। आखिर प्रशासन इन मासूमों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है? क्या इनके पास अपनी आवाज़ उठाने की ताकत नहीं है, इसलिए उन्हें अनदेखा किया जा रहा है?




