हादसे व घटनाओं और त्योहारों पर ही जांच पर जांच, समय बीता सब बंद
अन्यथा विभागीय अधिकारी व कर्मचारी अपने कर्तव्यों को ही भूलने लगते हैं और एक्स्ट्रा इनकम की तलाश में जुट जाते हैं तभी कोई ना कोई घटना घटित हो जाती है। मिलावटी कफ सिरप का मामला प्रशासनिक निष्क्रियता का उदाहरण माना जा सकता है।

हादसे व घटनाओं और त्योहारों पर ही जांच पर जांच, समय बीता सब बंद
रीवा। कोई घटना जब घटित हो जाती है और त्योहारी सीजन आता है तभी शासन- प्रशासन की सख्ती भी नजर आती है। जैसे ही समय आगे बढ़ा प्रशासनिक कसावट की नकल ढीली होती जाती है। जबकि ऐसी प्रक्रिया को रूटीन में रखना अब बहुत जरूरी हो गया है। अन्यथा विभागीय अधिकारी व कर्मचारी अपने कर्तव्यों को ही भूलने लगते हैं और एक्स्ट्रा इनकम की तलाश में जुट जाते हैं तभी कोई ना कोई घटना घटित हो जाती है। मिलावटी कफ सिरप का मामला प्रशासनिक निष्क्रियता का उदाहरण माना जा सकता है।
जिसकी कीमत उन मासूमों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। बच्चों की मौत ने पूरे तंत्र को हिला कर रख दिया। वहीं प्रदेश सरकार की खूब किरकिरी भी हुई। अंततः घटना से सबक लेते हुए शासन प्रशासन ने सख्त कदम उठाते हुए मेडिकल स्टोरों की जांच शुरू करवाई। अब जांच करने में क्षेत्रीय ड्रग इंस्पेक्टर्स को पसीने छूटने लगे हैं। क्योंकि लटकती कारवाई की तलवार से उनके पास भी इन्हें जांच करने जाना पड़ रहा है जिनसे मंथली इंकम फिक्स थी। बहरहाल अगर हादसा ना होता तो सभी प्रदेश के मेडिकल स्टोर व नर्सिंग होम संचालक शासन -प्रशासन की नजरों में ईमानदार बन रहते। वहीं प्रशासनिक अमला मेडिकल व्यवसाय से जुड़े अवैध गोरखधंधों से वसूली में जुटे रहते?
इसी तरह के कुछ हालात खाद्य एवं औषधि विभाग के भी रहे। पूरे साल ऑफिस से लेकर फील्ड तक यह अधिकारी खाद्य व्यवसाय से जुड़े लोगों से वसूली में मस्त रहे। अब वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश व दीपावली आने पर यही अधिकारी सख्ती दिखाते हुए ऐसे लोगों पर निशाना साधने जुटे हैं जहां से वसूली नहीं हो पा रही थी? अब खुलासा करने जुटे हैं कि होटल में एक्सपायरी डेट की सामग्री से खाद्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं, सवाल यह है इन्हें पहले क्यों नहीं दिखा। जबकि पहले से ही ऐसे होटल का संचालन पहले से होता आ रहा है लेकिन खाद्य एवं औषधि अधिकारियों को इंकम करने के चक्कर में भनक तक नहीं लगी। वजह यही है कि इन अधिकारियों के हाथ रुपए रूपी बेड़ियों से बंधे रहे। वैसे भी चर्चाओं पर गौर किया जाए तो जिला खाद्य एवं औषधि अधिकारी अम्बरीश दुबे एवं साबिर अली खान की जोड़ी वसूली के लिए हिट रही?
यही वजह है कि जिले में खाद्य व्यवसाय से जुड़े विक्रेताओं पर वसूली बाज अधिकारियों का कोई भय नहीं रह गया? वजह है कि त्योहारों के सीजन को छोड़कर आफ सीजन में इनके द्वारा वसूली कर दुकानदारों को अवैध कमाई के लिए छूट दे दी जाती है। तभी तो वह बेखौफ होकर हर सीजन में मिलावटी सामग्रियां ऊंचे दामों में बेंचकर लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने की हिम्मत जुटाते। वहीं बिकाऊ अधिकारियों की व्यवसाईयों को उनकी औकात भी पता रहती है, कितने में वह बिकेंगे? तभी तो वह प्रशासन के नाक के नीचे ही मिलावटी सामग्रियां बेंचकर मुनाफा खोरी में जुटे हैं। फिलहाल कलेक्टर की सख्ती के आगे बासूली बाज अधिकारियों की दाल गलती दिखाई नहीं दे रही है। क्योंकि जिला कलेक्टर द्वारा जांच का टारगेट फिक्स कर दिया गया है।




