बहुचर्चित सीया विवाद: कई अनछुए मुद्दे और अनुत्तरित प्रश्न
कई अनछुए मुद्दे और अनुत्तरित प्रश्न

बहुचर्चित सीया विवाद: कई अनछुए मुद्दे और अनुत्तरित प्रश्न
मध्य प्रदेश में पर्यावरण से जुड़ी अनुमतियों पर काम करने वाली स्टेट एनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट अथॉरिटी (SEIAA) को लेकर उठे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से 12 अगस्त तक जवाब मांगा है।
मध्य प्रदेश में पर्यावरण से जुड़े बहुचर्चित सीया विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर पीआईएल का जवाब राज्य सरकार को 12 अगस्त को देना है। इससे जुड़े कई अनुत्तरित मुद्दे और प्रश्न हैं, जिनका खुलासा होना बाकी है।
दरअसल, SEIAA (सीया) का मतलब स्टेट एनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट अथॉरिटी है, जो भारत सरकार का एक प्राधिकरण है। इसका गठन केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है। यह उनके नियमों और प्रावधानों के तहत काम करता है। स्टेट एक्सपर्ट अप्रेजल कमेटी (एसईएसी) को सबसे पहले पर्यावरण अनुमति के आवेदन प्राप्त होते हैं, जिसे वह अपनी अनुशंसा के साथ सीया को अनुमति के लिए भेजते हैं। भारत सरकार के प्रावधानों के अनुसार सीया ही वह अथॉरिटी है जो इसकी अनुमति दे सकती है। राज्य सरकार का इस काम में कोई दखल ही नहीं होना चाहिए। राज्य सरकार सीया अथॉरिटी को स्थानीय रूप से मदद करने के लिए एक अधिकारी को सचिव के रूप में नियुक्त करती है। ताजा विवाद के वक्त राज्य सरकार ने 2013 बैच की आईएएस अधिकारी उमा महेश्वरी को इसका सचिव नियुक्त किया था। विवादित बहुचर्चित मामले में जब एसईएसी ने अपनी अनुशंसा के साथ 237 मामले सीया को अनुमति के लिए भेजे थे तो ये मामले सीया चेयरमैन के सामने प्रस्तुत किए जाने चाहिए थे।
हद तब हो गई जब स्वयं सीया चेयरमैन ने कई बार तत्संबंधी बैठक करने के निर्देश भी दिए, लेकिन उनके निर्देशों को भी अनदेखा किया गया और 45 दिन निकाल दिए, ताकि सभी प्रस्ताव डीम्ड हो जाएं। डीम्ड का सीधा-सीधा मतलब है कि अगर 45 दिन में आवेदन का निराकरण नहीं हुआ तो संबंधित आवेदक खुद ही सक्षम है और यह मानकर कि मुझे अनुमति (डीम्ड) मिल गई है, वह अपने प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर सकता है।
ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि किन नियमों और प्रावधानों के तहत सीया की तत्कालीन सचिव ने एसईएसी से प्राप्त प्रस्ताव को बजाय अध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत करने के इसे डीम्ड मानते हुए मंजूरी के लिए प्रमुख सचिव को प्रस्तुत कर दिए और प्रमुख सचिव ने इस प्रस्ताव को अनुमोदित भी कर दिया। इस तरह के प्रस्ताव देने और इसका अनुमोदन करने के अधिकार का तो नियमों और प्रावधानों में कहीं उल्लेख ही नहीं है।
अब इस बहुचर्चित विवाद में सुप्रीम कोर्ट में दायर पीआईएल में राज्य शासन को 12 अगस्त को जवाब देना है। सरकार के साथ दिक्कत यह है कि अगर वह दी गई 237 अनुमतियों को निरस्त करती है तो यह मान लिया जाएगा कि सरकार ने अपनी गलती मान ली है और अगर निरस्त नहीं करती है तो उसे यह समझ में नहीं आ रहा है कि क्या जवाब दिया जाए।कुल 193 पेज की इस पीआईएल का जवाब देने के लिए राज्य सरकार सभी स्तरों पर विचार विमर्श कर रही है।
निरस्त हो सकती हैं 237 अनुमतियां
इसी बीच वल्लभ भवन के सूत्रों के अनुसार सरकार इस संबंध में अपने बचाव के लिए बिना सीया अध्यक्ष की अनुमति के जारी की गई 237 मामलों की अनुमति निरस्त कर सकती है। साथ ही उसे कैसे नियमित और नियमानुसार किया जा सकता है इस संबंध में भी चर्चा की जा रही है। यह देखना दिलचस्प होगा की इस तिथि तक सरकार इसका क्या जवाब तैयार करती है? साथ ही यह भी कि सुप्रीम कोर्ट 12 अगस्त को मामले में क्या रुख लेती है?
निगम-मंडलों में नियुक्तियों की सुगबुगाहट
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए उत्साहजनक खबर जल्द मिल सकती है। मध्य प्रदेश में निगमों और मंडलों में पदाधिकारियों की नियुक्ति के लिए नामों की सूची को अंतिम रूप देने की कवायद तेज हो गई है। इस बारे में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भाजपा अध्यक्ष के साथ ही राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिव प्रकाश और प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह के साथ दो लंबी बैठकें हो चुकी हैं। सूची पर दिल्ली से मोहर लगते ही घोषणा हो सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी किन नेताओं और कार्यकर्ताओं को महत्व देती है और किनकी लॉटरी लगती है?
डेढ़ साल में राजभवन में पांचवें प्रमुख सचिव पदस्थ
मध्य प्रदेश के राजभवन में नवनीत कोठारी ने हाल ही में प्रमुख सचिव का कार्यभार संभाला है। वह पिछले डेढ़ वर्षों में इस पद पर आने वाले पांचवें आईएएस अधिकारी हैं। इन डेढ़ वर्षों के दौरान सबसे पहले डीपी आहूजा पदस्थ थे। इसके बाद संजय शुक्ला केवल ढाई माह, मुकेश गुप्ता 9 माह और के सी गुप्ता केवल 6 माह पदस्थ रहे। अभी एक दो रोज पहले ही नवनीत मोहन कोठारी ने के सी गुप्ता के स्थान पर यहां प्रमुख सचिव पद का प्रभार संभाला है। ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कोठारी यहां कितने माह तक अपनी सेवाएं दे पाएंगे। ये सभी अधिकारी भारतीय प्रशासनिक सेवा में वरिष्ठ अधिकारी होकर प्रमुख सचिव और अपर मुख्य सचिव स्तर के हैं।
झाबुआ कलेक्टर: डंपर हादसे में तेज कार्रवाई से उठे सवाल
झाबुआ कलेक्टर नेहा मीना प्रशासनिक नवाचार, संवेदनशीलता और जनसेवा के लिए प्रदेशभर में जानी जाती हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के हाथों उनके नवाचार पुरस्कृत हो चुके हैं, लेकिन हाल ही के डंपर हादसे ने इस लोकसेवक की व्यवस्था पर जिले में नागरिकों ने असहज सवाल खड़े कर दिए। कलेक्टर की शासकीय कार को डंपर ने टक्कर मारी। इसके बाद चंद घंटों में डंपर मालिक, अवैध रेत कारोबार, रेत के गोदाम की सीलिंग, लाखों की पेनल्टी, जमीन की पड़ताल और ताबड़तोड़ एफआईआर जैसी कार्रवाई कर दी गई। सवाल यही है कि हर विभाग कैसे जाग गया? यही फुर्ति, यही तेज कार्रवाई उन हादसों में क्यों नहीं होती, जिनमें रोज आम नागरिक अवैध डंपरों की चपेट में आकर दम तोड़ देते हैं? सच्चाई तो यह है कि अवैध रेत का कारोबार हमेशा से चलता आ रहा है। प्रशासन की त्वरित कार्रवाई बस वहीं तक सिमट जाती है, जहां किसी ‘खास’ की बात आ जाए। आम आदमी हादसों का शिकार हो, कुचला जाए या बेमौत मारा जाए तो प्रशासन के लिए वह सिर्फ एक संख्या है, जिसकी पीड़ा भीड़ के शोर में दब जाती है।
अब बात पूर्व मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस की
प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस को लेकर दो बातें सामने आ रही हैं, लेकिन ये दोनों बातें एक दूसरे की विरोधाभासी हैं। सूत्रों से अनुसार अपने पुराने संपर्कों के माध्यम से इकबाल सिंह बैंस केंद्र सरकार में कोई पद प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, दूसरी, मध्य प्रदेश सरकार उनके कुछ मामलों को लेकर शिकंजा कसने की तैयारी कर रही है। सूत्रों से अनुसार आईएफएस अधिकारी एलएम बेलवाल की आजीविका मिशन में सीईओ पद की संविदा नियुक्ति इकबाल सिंह को भारी पड़ सकती है। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि आने वाले समय में इकबाल सिंह बैंस का भविष्य क्या होगा?




