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मध्य प्रदेश: आरक्षण के आधार पर पदोन्नति देने के नियम को चुनौती के मामले में नहीं हुई सुनवाई
मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों का प्रमोशन लंबे समय से अटका था। मोहन यादव सरकार ने इसकी पहल की, तो विवाद खड़ा हो गया। अब मामला हाई कोर्ट में है।

मध्य प्रदेश में आरक्षण के आधार पर पदोन्नति देने के नियम को चुनौती देने के मामले में मंगलवार को सुनवाई नहीं हुई। दरअसल, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा की युगलपीठ के समक्ष यह मामला निर्धारित था। न्यायमूर्ति सचदेवा की अनुपस्थिति के चलते मामले की सुनवाई नहीं हो सकी।
इस मामले में विगत सात जुलाई को हाई कोर्ट ने मुख्य सचिव सहित अन्य को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने अंडरटेकिंग दी थी कि अगली सुनवाई तक उक्त पॉलिसी के तहत किसी को प्रमोशन नहीं दिए जाएंगे।
याचिकाकर्ता भोपाल निवासी डा. स्वाति तिवारी सहित अन्य की ओर से अधिवक्ता सुयश मोहन गुरु सहित अन्य पक्ष रख रहे हैं। उनकी दलील है कि वर्ष 2002 के नियमों को हाई कोर्ट के द्वारा आरबी राय के केस में समाप्त किया जा चुका है।
इसके विरुद्ध मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट में मामला अभी लंबित है, इसके बावजूद सरकार ने नियम बना दिए।
सरकार ने बनाए नियम… सामान्य वर्ग ने किया विरोध
- पदोन्नति पर रोक वर्ष 2016 में हाई कोर्ट जबलपुर के मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम 2002 को निरस्त करने के समय से लगी हुई थी। इस बीच एक लाख से अधिक अधिकारी-कर्मचारी बिना पदोन्नत हुए सेवानिवृत्त हो गए।
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- कर्मचारी लगातार यह मांग उठाते रहे कि सरकार कोई रास्ता निकाले। मोहन सरकार ने सभी प्रभावित पक्षों से संवाद करके नए नियम बनाए, जिसका सामान्य वर्ग के कर्मचारियों ने इस आधार पर विरोध किया कि इसमें वही सब प्रावधान किए गए, जो पुराने नियम में थे।
- कोर्ट ने सुनवाई के बाद नए नियम के क्रियान्वयन पर रोक लगाते हुए पुराने और नए नियम में अंतर का चार्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। सामान्य प्रशासन विभाग ने इन्हें तैयार करके महाधिवक्ता कार्यालय को उपलब्ध कराया है, जिसके आधार पर मंगलवार को न्यायालय के समक्ष सरकार का पक्ष प्रस्तुत किया जाएगा
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गलत नियम जब माने तो पदावनत भी करें
उधर, सपाक्स के संस्थापक अध्यक्ष केपीएस तोमर का कहना है कि जब सरकार ने नए नियम बना लिए तो पुराने नियम को निरस्त किए जाने के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट से वापस क्यों नहीं ली गई।
यदि सशर्त पदोन्नति ही देनी थी तो फिर नौ वर्ष तक कर्मचारियों को मानसिक प्रताड़ना क्यों दी गई। 2002 के नियम से जो पदोन्नतियां हुईं, उन्हें पदावनत क्यों नहीं किया जा रहा है?




